ये काव्य रचना आज कल के मध्यम वर्गीय परिवार के आदमी के बारे में है कि वह आज के समय में जब किसी भी मामले में खुद को बेब्स पाता है तो क्या अपने मनोभावों…
एक भिखारी था ऐसा दिखता वर्षों से थके जैसा चेहरे पर मेहनत का नूर था फिर भी क्यों बेबसी से चूर था शायद वो किसी बाप का बेटा था जो शायद उम्मीदों से हार…
तजुर्बे का अगर अद्भुत संजोग है बुढ़ापा तो समझिए जीवन का एक रोग भी है बुढ़ापा इस समय में इंसान बेबसी के दौर से इस कदर गुजरता है । जवानी सा जोर नहीं रहत…
लिखने को हुई जो कलम तैयार तुम भी करना जरा सोच विचार करते हो अगर प्रकृति से प्यार बातें सुन लो तुम मेरी चार जल की महिमा है अनन्त अपार व्यर्थ गंवा न क…
हारिये न हिम्मत तब तक जब तक हड्डियों में जान बाकी है । करना है संघर्ष तुम्हें जब तक जीत का मैदान बाकी है । हारिये न हिम्मत तब तक जब तक हड्डियों में…
नेताओं को कोसने से अच्छा हम मिलकर कुछ शुरआत करें । आम आदमी को संगठित कर उनसे विकास की बात करें । नेता ने तो चलना है रा…
ये उन्नति है या तमाशा एक तरफ साक्षी , दूसरी तरफ बिपाशा । कॉलेज में रखती एक मर्यादा । दूसरी नशों व्यसनों पर हर समय आ…
कविताएँ