मिडल क्लास आदमी

ये काव्य रचना आज कल के मध्यम वर्गीय परिवार के आदमी के बारे में है कि वह आज के समय में जब किसी भी मामले में खुद को बेब्स पाता है तो क्या अपने मनोभावों को, सिस्टम को बदलने में खुद कुछ न कर पाने और सरकारों को कोसने की पुरानी आदत की लहर में खो जाने पर क्या-क्या भाव उसके मन में आते है वे सब इसमें वर्णित हैं। आईए आनंद लें । 

 बढ़ रहा है कलयुग का पहरा
बस यही सत्य जानता हूँ
मैं तो एक मिडल क्लास आदमी हूँ
बस चाय पर चर्चा करना जानता हूँ
देश में बढ़ रहे पढ़े लिखे लुटेरे
ये बात दिल से मानता हूँ
गिर रहा शिक्षा का स्तर दिन प्रतिदिन
मन के बर्तन को बेबसी की राख से माँझता हूँ
मैं तो एक मिडल क्लास आदमी हूँ
बस चाय पर चर्चा करना जानता हूँ।
देखता हूँ बेबसी गरीबी की 
उनके लिए प्रभु से  कर्म की जागृति मांगता हूं
जहां खत्म होती है, मुझे क्या लेना की लकीर
हर तीसरे दिन जाने अनजाने उसे लांघता हूँ
मन में लिए तूफान जिंदा दिली के
उसे सब्र और शांति के लिफाफे से बांधता हूँ
मैं तो एक मिडल क्लास आदमी हूँ
बस चाय पर चर्चा करना जानता हूँ



लफ्जों की तलवार,  कुछ ऐसा कर जाए वार
इसे ही बस देश भक्ति का पेशा मानता हूँ
किसी कोने में हो जाये जागृति का प्रकाश
युवाओं से बस यही उम्मीद बांधता हूं
अकेले के करने से क्या होंगे परिवर्तन
ये सच भलीभांति जानता हूँ
आखिरी सांस तक प्रयास तो नहीं रोक सकता
अपनी जिद को भी तो मानता हूँ
मैं तो एक मिडल क्लास आदमी हूँ
बस चाय पर चर्चा करना जानता हूँ।

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