Wednesday, 15 April 2020

आदमी की गाथा/AADMI KE GATHA/MAN'S POETRY

आदमी की गाथा/AADMI KE GATHA/MAN'S POETRY
"आदमी की  गाथा"

हर आदमी एक मज़दूर  है,
कोई कम तो कोई ज़्यादा जबूर है,

संघर्ष से मिलता ज़न्नत का नूर है,
यही प्यारे दुनिया का दस्तूर है।

सभी को अपनी खासियतों पर गरूर है,
पर सभी में कहीं न कहीं कमियां ज़रूर  है,

अपने कामों को दूसरों पर फेंकते देखे,
इतने पागलों में कुछ नेक भी देखे,

जंग जितना आसान नही प्यारे,
इसमें इंसान अपना सब कुछ वारे,

संतुष्ट शब्द कहीं खो सा गया है, 
हर कोई दुखी हो सा गया है।

जीवन में सब कुछ उसकी माया है
उसे भी भला कोई समझ पाया है

इतना ऊँचा भी मत उड़ो जैसे पेड़ खजूर है

न छाया दे ,फल भी लागे अति दूर है।


सूरज की माना गर्मी जरूर है,
पर बादलों के सामने झुकना उसे मंजूर है,

सुखी आदमी दिखता अब दूर है,
सबको कोई न कोई दुःख जरुर है।

अपने फर्ज को  सबसे बड़ा मानो,
अपनी मंजिल को जल्दी पहचानो,

रुकना मुर्दे की निशानी है,
चलते रहो जब तक जिंदगानी है।

होंसले रखो हमेशा बुलंद,
हंसो और बोलो हमेशा मंद मंद,

खुदा के नाम को रखो अपने संग,
फिर देखो तुम कुदरत के रंग।

चींटी चढ़ जाये जब पहाड़,
तू भी हो जा लक्ष्य पर सवार,

तेरा भी हो जाएगा एक दिन कल्याण,
मेहनत करता जा तू अपार।

करनी का फल पाता है हर कोई,
इसमें न किसी का कोई कसूर है,
क्योंकि हर आदमी यहाँ एक मजदूर है,
कोई कम तो कोई ज़्यादा मजबूर है।  

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Sunday, 29 March 2020

ईद मुबारक देता हूँ - कृष्ण मलिक अम्बाला/

ईद मुबारक देता हूँ - कृष्ण मलिक अम्बाला/
ईद के सुअवसर पर कुछ पंक्तियाँ ।
कवि कह रहा है —
“ईद मुबारक देता हूँ “
भारत का हूँ मैं एक सिपाही
हिन्दू -मुस्लिम है सब मेरे भाई
हिन्दू हूँ बेशक , सभी को सम्मान देता हूँ
अपने धर्म के साथ, दूसरे से सीखें लेता हूँ
नहीं है दुश्मन हिन्दू मुस्लिम , क्यों व्यर्थ भड़कातें है
चार भाई ही तो है देश में , क्यों नही साथ रह पाते हैं
करता हूँ पुरे जग से आह्वान , बेशक हिन्दू बेशक मुसलमान
हिन्दू रहो बेशक , करो दूसरे धर्मों का भी सम्मान
अच्छाई बुराई सब धर्म में मिलेगी , कुछ राक्षसों का है परिणाम
नहीं तो सभी धर्म ही सुनाएँ , अमन चैन का पैगाम
एक ही डाली के हैं सब फूल
लड़ झग़ड़ने की न कर भूल
खुद भी हूँ हिन्दू , सभी हिंदुओं को कहता हूँ
क्यों नहीं रहते मिलकर तुम , यही अफ़सोस में रहता हूँ
हर धर्म में ज्ञान है अद्भुत , ले लो भाईयों जी भरकर
ज्ञान देने वाला नही है पूछता , दूसरे धर्म से हो तुम मगर
मुस्लिम भी है मेरे भाई , वफादारी धर्म की उनसे सीखो
तीस रोज देते कुर्बानी , आये अक्ल तो देकर देखो
जागो हिंदुओं जागो, अब तुम जाग ही जाओ
सभी धर्म के हैं अपने भाई , इनको तुम गले लगाओ
हमेशा से हमें एक बात गयी गई है सिखलाई
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई , आपस में सब भाई भाई
आज हिन्दू हो कर ओह रखवालों , पहल एक कर देता हूँ
तुम भी सभी को पहुँचाओ , ईद मुबारक देता हूँ
????????????
तुम भी सभी को पहुँचाओ , ईद मुबारक देता हूँ
©® KRISHAN MALIK 07.07.2016

सपनों की भूख में फर्जों से लिया मुख फेर/SOCIAL AWARENESS POETRY

सपनों की भूख में फर्जों से लिया मुख फेर/SOCIAL AWARENESS POETRY
मैं नहीं हूँ औरत का विरोधी बहना
पर चाहता हूँ समाज से कुछ कहना
आज की औरत अपने फर्ज से मुख मोड़ गयी
नौकरी के चक्कर में बाकि चिंता छोड़ गयी
उसको बहन कैसे याद दिलाएं
पैसे से बड़े फर्ज का मोल
कैसे उसको आईना दिखाएँ
फर्ज होते हैं अनमोल
घर का गहना औरत कहलाती
तभी वो गृहणी कहि जाती
आदमियों ने भी लालच में उनको
पैसे के जाल में फैंक दिया
बन गयी चक्की पैसे की
बच्चों को अग्नि में सेक दिया
सोचना दोनों पक्षों को गहरायी से
आघात ना लेना मेरी लिखाई से
कहना ये सिर्फ चुनिंदा औरतों के बारे में
खुद में बहन मत ले लेना
हो भूल मेरे शब्दों से अगर
छोटा भाई कहकर माफ़ी दे देना
औरत को करता हूँ सलाम उनको
फर्ज की दिल से कदर है जिनको
नफरत है हर उस मर्द से
जिसके लिए वो दूर होती हैं फर्ज से
आने वाली पीढ़ी को बचाना है
उनको माँ से संस्कार दिलाना है
वो तभी सम्भव हो पायेगा
जब माँ के पास समय आ पायेगा
अभी हूँ लफ्जों का कच्चा खिलाड़ी
खेलनी है रस की लम्बी पारी written -04 /05 /2016
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*वक्त है बेटी सम्भल जा अभी भी */WAQT HAI BETI SAMBHAL JA/BETI BCHAO BETI PADHAO BASED

*वक्त है बेटी सम्भल जा अभी भी */WAQT HAI BETI SAMBHAL JA/BETI BCHAO BETI PADHAO BASED
*वक्त है बेटी सम्भल जा अभी भी *
दिल का महकमा कुछ कह रहा है ।
नहीं पता ये लड़कियां जींस टॉप पर क्यों मरती है ।
पर लगती सूट सलवार में लड़की असल में लड़की,
जिसे मेरी नजरें झुककर सलाम करती हैं।
जीन्स टॉप तो होता है आँखों का घर्षण
सूट सलवार में ही होता , हमारी सभ्यता का दर्शन
गज की गुंधवीं चोटी की रौनक , स्ट्रेट बालों में कहाँ होती है ।
जो करती इस तरह का पहनावा , चर्चा हर अच्छे किस्से में होती है।
आँचल तेरा नहीं बहन , वासना का आधार ।
ढक दुपट्टे से इसे , ले अपना रूप सँवार ।
कुछ पंक्तियों के माध्यम से मैंने , अपने रखें हैं विचार ।
करना बहनों मेरे तर्क पर तुम , दिल से सोच विचार ।
आईने के सामने जाकर , देख तो मेरी पगली बहना ।
फिर लगे पता तुझे , गलत है या सही मेरा कहना ।
अगर आये पसन्द तुझे , ये बताया सोभर रूप
अपना और पहुंचा आगे भी , मेरे इन शब्दों की गूँज
रहने वाले है हरियाणा के , करते सलाम हम पंजाब को भी
यही पहनावा बने पूरे भारत का , यही है मेरे ख्वाब भी
सूट सलवार का जीन्स क्या करे मुकाबला
बेशक आजकल बेटी का इस ओर चल पड़ा काफिला
इस विदेशी नाच में नाच रही बेटी
होता अच्छा अगर संस्कृति न खोती
एक आवाज मेरी माँ को भी है , अपनी बेटियों को समझाएं
खुद भी करे शुरू लेना दुप्पटा , बेटियों को भी आँचल ढकना सिखाएं।
रोब तेरी सुंदरता की रौनक का , सूट सलवार में भी होगा ।
करके देख शुरू ये पहनावा , गलत न बिलकुल ये कहना होगा ।
घूंघट का लेने का नहीं है मेरा कहना ,
पर जो पहचान थी भारत की , मत इसे तुम हर हाल में खोना
अभी भी वक्त है सम्भल जा बेटी , बात देश की आन की
बन जा मूरत सादगी की बहना , दिखा फिर से पहचान हिंदुस्तान की ।
लिखे है काफी कड़वे सच , पर लड़की के बढ़ते कदम पर न दाग बने
करे तरक्की बेटी जी भर के , बड़ा उसका नाम और बड़े उसके भाग बने
उस मजबूर बाप को भी देखा मैंने , जो बेब्स है लड़की को कुछ कहने में
दम घुटता है उस बाप का , ये नंगापन बेटी का सहने में
हो अगर गलत वास्तव में तो , दिल से उतार देना ।
अगर लगे दम इस कड़वे सच में , कुछ बहनों को भी ये विचार देना
मेरी सोच लड़कियों को जीन्स टॉप रोकने की नहीं बल्कि उन्हें सूट सलवार और बालों की गुत बनाकर जो उनमें सभ्य सुंदरता आती है उसके बारे में केवल महसूस कराना है । इसे पढ़ने के बाद भी आप बेशक जीन्स ही पहने । क्योंकि वो ही अपनाएगी जो इस सन्देश को गहरायी से समझ पायेगी।
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© कृष्ण मलिक 21.06.2016 and revised on 25.08.2016