जैसा की लेख के शीर्षक से ही पता चलता है इसमें श्रम दान के महत्त्व के बारे में युवाओं को आह्वान करते हुए कहा गया है कि वे श्रम दान के लिए शर्म का दान करें। शारीरिक श्रम में कैसी शर्म, यदि यह आदत बचपन से ही बच्चों को घर से और फिर विद्यालय से न डाली जाए तो बच्चे एक चाय का कप भी अपनी माँ को रोब से मँगवा कर कहते हैं जैसे उनकी माँ ने उनकी मासिक वेतन के आधार पर गुलामी की हो । कुछ सोशल मीडिया के जो कंटेन्ट बनाने वाले उनके प्रभाव में शॉर्ट्स और इंस्टाग्राम रील उनके मन पर इस प्रकार से हावी हो जाती हैं। फिर वो बचपन से ही मल्टीनेशनल कंपनी के खुद को मालिक समझ लेते हैं। उनसे कोई पूछे कि जीतने भी सफल एवं महान हस्तियाँ हुई हैं उनका वर्तमान का रुतबा आपको दिखता है क्या आपको उनका लगातार अतीत में किया हुआ संघर्ष दिखाई दिया। क्या आपने उस पर अनुसंधान किया है।
क्या युवाओं को उन कहानियों का पता है? माना आज तकनीक का युग हैलेकिन आज के युग की मांग भी यही कहती है कि युवा मल्टी स्किल हो उसमें एक से अधिक गुणों का समावेश हो। अभी तो आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमता जिसे हम ए आई कहते हैं उसका समय तेजी से बढ़ रहा हैलेकिन आज के युवाओं को शारीरिक कार्य की आदत स्कूल स्तर से ही डाल देनी चाहिए। पहले गुरुकुल शिक्षा होती थी, बच्चा घर से बाहर रहता था उसे अपने कमरे को सेट करना, चाय वगैरा बनाना, अपने कपड़े साफ करना और अन्य घरेलू कार्य खुद करने आते थे। विद्यालयों में अभी थोड़ा बच्चों में वीआईपी कल्चर पैदा होता जा रहा है उनके कमरे में एक कागज का टुकड़ा गिरा हुआ है तो वो ये समझेंगे कि हम विद्यालय मे पढ़ने आते हैं, सफाई करने नहीं। लेकिन विद्यार्थियों का चहुंमुखी विकास कैसे होगा यदि वे हर तरह के कौशल नहीं सीखेंगे। वर्तमान आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने भी श्रम दान को स्वच्छता ही सेवा के रूप में कई बार प्रेरित किया है।
यहाँ तक कि सीबीएसई के curriculum में भी ईसे दिया गया है। बस अच्छे खासे प्राइवेट स्कूल कि बच्चे के माता-पिता उनसे झगड़ा न करें कि आप हमारे बच्चे को क्या सीखा रहे हैं, उसके चक्कर में वे ईसे इम्प्लीमेंट अर्थात क्रियान्वित ही नहीं कर पाते। केवल कागजों में ही अधिकतर स्कूल ग्रेडिंग करके उनकी डी एम सी में दिखा देते है। चाहे पूरा साल उस बच्चे ने अपने हाथ से अध्यापक को एक बार भी पेन तक न उठाने का कष्ट किया हो। कितने भौतिकवादी हो गए हैं हम लोग, पैसे के लिए शिक्षा की दुकानों को ऐसे चला रहे हैं, स्कूलों को रटन विद्या वाली फैक्ट्री बना दिया है।
सबसे बड़ी बात यह है कि बच्चों के माता-पिता भी इस बारे में लेकर विशेष रुचि नहीं रखते हैं, उन्हे बस अपने स्टेटस से मतलब है कि हमारा बच्चा आस पड़ोस के लेवल के बच्चों के स्कूल से किसी न किसी मामले में ऊपर रहना चाहिए। शिक्षा का मतलब अब केवल खूब और खूब सारा धन कमाना हो गया है। एक अच्छे पैकेज वाली जॉब लग जाए बच्चे की पेरेंट्स समझते हैं उन्होंने सारा देश जीत लिया है जबकि नैतिक मूल्य कहाँ गए हैं।
बच्चे को इतनी रेस में भगाने वाले उनके माता पिता ही हैं, यदि वो बच्चे को विद्या ज्ञान के रूप में देकर अंकों की भूख के रूप में न दें और तो जितनी भी आत्महत्याएं अंकों के कम आने के कारण होती हैं और पूरे का पूरा खानदान कम अंकों की वजह से नष्ट हो जाता है वो न हो।
इस मुद्दे पर गहन चिंतन करने की जरूरत है, सी बी एस ई के पाठ्यक्रम में दिया हुआ है कि बच्चे वर्ष में कुछ घंटे शारीरिक श्रम दान में दें, उल्टा पेरेंट्स को स्कूल संचालकों से ये कहना चाहिए कि आप ईसे पाठ्यक्रम में लागू क्यों नहीं करते जिससे आपका बच्चे का सम्पूर्ण विकास होगा। इसके लिए बच्चों के माता-पिता को दूसरे देशों से सीखने की जरूरत है। वहाँ स्कूलों में बच्चे टॉइलेट तक साफ करते हैं, उसका कारण ये है कि बच्चे को घर के सभी काम करने आने चाहियें। नौकर रखने का कल्चर दूसरे देशों में ज्यादा नही है यहाँ पर कुछ पैसे इंसान के पास आ जाते हैं तो हर कार्य के लिए नौकर रख लिए जाते हैं।
भारत में सोशल मीडिया कि लत ने युवाओं को शारीरिक काम से काफी दूर कर दिया है, इन नैतिक मूल्यों को दुबारा से जागृत करने के लिए अभिभावकों को आगे आना होगा।
युवाओं को भी कहना चाहेंगे कि आप भी यदि विदेशों में भ्रमण कर अपनी कुछ पहचान बनाना चाहते हो तो उसके काबिल अभी से खुद को बनाओ, क्योंकि वहाँ पर अपने घेरेलू कार्य सभी खुद करते हैं।
इसके लिए अध्यापकों को भी गंभीर और एक जुट होने कि जरूरत है। उन्हें सरकारों से भी इस बारे में मदद की अपील करनी होगी। जितना गंभीर वे अपनी सुविधाओं के जरा सा देरी होने में हो जाते हैं, उतना ही गंभीर उन्हें बच्चों के नैतिक विकास के लिए आवाज उठाने की जरूरत है। नहीं तो बच्चों में मूल्य विकसित नही होंगे वे अपराध की तरफ और नशों की तरफ अग्रसर होंगे क्योंकि उन्हें उसमें सही गलत का भेद ही नहीं रहेगा।
आप सभी से गुजारिश है यदि यह लेख आपको लगा हो जागृति का संदेश देने कुछ हद तक सफल हुआ है तो आगे अपने सर्कल में ईसे शेयर करें ताकि देश दुबारा से नैतिक मूल्यों से सम्पन्न युवाओं वाला देश हो जाए
आपका अपना कृष्ण मलिक अंबाला
जय हिन्द जय भारत


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