Thursday, 13 February 2020

जागरूक हों आज के अंधियारे युग में/AWARENESS POETRY

आंखें खुली मन मूंद लिया
क्या आधुनिकता की छाया है ।
अन्याय हो दूसरों के संग
वीडियो बना सकती है दुनिया
मदद करनी हो तो कह देती
ये तो प्रभु की माया है ।
वा रे , मानव प्यारे
तेरे रंग भी हैं न्यारे
आग लगे पड़ोस में कहता है मुझे क्या
जब आग लगे तेरे ही
तो कहता है तुझे क्या
न मदद करता है न मदद लेता है ।
अकेले बना ली तूने दुनिया, बेमतलब अकेलेपन की घुटन सहता है ।
जाग एक बार , बुद्धि को दे विराम
तन की आंखें मूंद कर और मन की आंखें खोल कर ,
दे विवेक को निर्णय की लगाम
फिर देख ये समाज तेरा ही परिवार
यही आएगा मन से पैग़ाम
होगी मन की शांति
मिलेगा बुद्धि को आराम
अन्याय अत्याचार करना है पाप ये तो जाने
लेकिन सहना और किसी और पर होने देना ,
ये क्यों न माने
यही बेबसी क्या तेरी मर्दानगी है
जिसकी युवा शक्ति की जग गाथा गाता है।
अब बन जा विवेक शील अधिकारों में
यही तो बस तो बस लेखक चाहता है ।
कर दिया लेखनी ने एक प्रयास
जग में देकर पैगाम जिंदादिली का
छोड़ आलस की इस नादानी को
है बस जोश जुनून की आस
अन्याय कुरीतियां पड़ जाएंगी कमजोर खुद ही
अगर होगा जागृति का प्रकाश
जब छोड़ देगा इंसान बस खुद का महल बनाना
सीख लेगा दूसरों के काम आना
सहारा बन गया अगर दूसरों का मुसीबत और अत्याचार में
तब सफल होगा मेरा ये सब लिख पाना
फिलहाल यही बात दोहराता हूँ।
बदलना ये जो हालात हर तरफ छाया है
आंखें खुली मन मूंद लिया
क्या आधुनिकता की छाया है ।
©® कृष्ण मलिक अम्बाला
24.10.2018
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